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Post By : Bhaskar
Author : Bhaskar Views 25
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इंदौर में नाबालिग को संतान माना, मां को पत्नी नहीं:महिला ने कोर्ट के फैसले को दी चुनौती; सुप्रीम कोर्ट से की शिकायत

'यह कैसा कानून है? जिसे मेरे बेटे का पिता माना, उसे मेरा पति नहीं मान रहे हैं। मंदिर में हुई शादी के पक्ष में गवाही भी कराई, लेकिन सबकुछ खारिज कर दिया गया। मुझे और मेरे बेटे को इंसाफ दिलाइए।' इंदौर के फैमिली कोर्ट के ऑर्डर को चुनौती देते हुए 40 साल की एक महिला ने ऐसी चिट्‌ठी 31 जुलाई को राष्ट्रपति, सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायधीश और महिला आयोग को भेजी है। इसमें दावा किया है कि फैमिली कोर्ट ने उसके नाबालिग बेटे को पति से भरण-पोषण दिलाया, लेकिन उसे पत्नी नहीं माना। यदि वो मेरा बेटा नहीं तो DNA जांच कराइए, दूध का दूध, पानी-का पानी हो जाएगा। सिलसिलेवार समझ लीजिए पूरा मामला महिला और नाबालिग बेटे ने 2018 में इंदौर के एक कांट्रैक्टर के खिलाफ फैमिली कोर्ट में केस किया था। भरण पोषण मांगा। महिला ने दावा किया था कि यह उसकी दूसरी शादी है, जो 2009 में हनुमान मंदिर में की थी। इनसे एक बेटा भी है और 6 महीने पहले कांट्रैक्टर ने मुझे छोड़ दिया। महिला ने खुद के लिए 1 लाख और बेटे के लिए 50 हजार रुपए महीना भरण पोषण के दिलाने की मांग की। जवाब में कांट्रैक्टर ने पत्नी और बेटे को अपना मानने से मना कर दिया। कहा कि 'मैं पहले से शादीशुदा हूं। संतान भी है। आरोप लगाया कि महिला ने पहले पति के साथ मिलकर मुझे ब्लैकमेल किया है। न मैं इसका पति हूं, न इससे कोई बेटा हुआ है।' 2019 में कोर्ट ने बेटे को अंतरिम राहत दी। जन्म प्रमाण पत्र और स्कूल मार्कशीट के आधार पर उसे कांट्रैक्टर का ही बेटे माना। उसके लिए 3500 रुपए महीना देने के आदेश दिए। हालांकि, महिला पहले पति से तलाक और कांट्रैक्टर से दूसरी शादी के दस्तावेज पेश नहीं कर पाई। 29 जुलाई 2024 को कोर्ट ने विस्तृत आदेश जारी कर दिया कि महिला के पक्ष में पर्याप्त सबूत नहीं है। उसका भरण-पोषण का दावा खारिज कर दिया। हालांकि, नाबालिग को कांट्रैक्टर की संतान मानकर भरण पोषण 3500 रुपए महीने से बढ़ाकर 5 हजार कर दिया। अब महिला ने इसी ऑर्डर को चुनौती दी है। शिकायत में महिला ने ये लिखा... मेरा और कांट्रैक्टर पति का 2018 से फैमिली कोर्ट इंदौर में केस चल रहा था। जजमेंट 29 जुलाई 2024 को हुआ है, जिससे मैं संतुष्ट नहीं हूं। मेरे साथ व मेरे बेटे (13) के साथ अन्याय हो रहा है। मेरे पति पहले से शादीशुदा थे, यह बात उन्होंने छिपाई। मेरी पहली शादी में राजी-मर्जी से तलाक हुआ। इसके कागजात थे, जो दूसरे पति ने जला दिए। मोबाइल से फोटो भी हटवा दिए। जो शादी के गवाह थे, उनकी मौत हो चुकी है। अब दूसरी शादी की एकमात्र गवाह मेरी सहेली है। बाकी मेरी डिलीवरी के कागज, बच्चे का जन्म प्रमाण पत्र, मेरा व बच्चे का आधार कार्ड, मेरा वोटिंग कार्ड, बच्चे के स्कूल का आईडी कार्ड, बच्चे की पुरानी मार्कशीट, बच्चे की गवाही, मेरे मकान मालिक जहां हम रहते थे, उनकी गवाही, शपथ पत्र को झूठा बताकर खारिज कर दिया है। मेरे बच्चे के पिता कांट्रैक्टर ही हैं, जिनके साथ 2009 से 2018 तक रही हूं। फिर भी मेरे साथ न्याय नहीं हुआ है। मेरा केस रि-ओपन किया जाए। उसकी जांच बैठाई जाए। जिस आधार पर फैसला सुनाया गया है कि मैं पूर्व की तलाकशुदा नहीं हूं। यह गलत है। मेरे पहले पति की दूसरी शादी कई बरसों पहले हो गई और दूसरी पत्नी से उनके बच्चे भी हैं। या तो न्याय हो या मुझे और मेरे बच्चे को इच्छामृत्यु की अनुमति दी जाए। मैं अपने बच्चे को अपमानजनक जीवन देकर जीवित नहीं रहना चाहती।

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